विद्या ददाति विनयम्

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हिन्दी शब्दों का वर्गीकरण (हिन्दी शब्दों के विभिन्न प्रकार) || Classification of Hindi words (Different types of Hindi words)

भाषा की बात की जाए तो ध्वनियों, वर्णो (अक्षरों) के पश्चात 'शब्द' का अध्ययन किया जाता है। 'शब्द' वर्णो (अक्षरों) के योग से बनते हैं। भाषा में जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है उनके कई प्रकार हैं। उन्हीं के बारे में नीचे विवरण दिया गया है।

सर्वप्रथम शब्दों को ध्वनि के आधार पर वर्गीकरण किया जाए तो इनके दो प्रकार हो सकते हैं।
(क) ध्वन्यात्मक शब्द
(ख) वर्णात्मक शब्द

(क) ध्वन्यात्मक शब्द - जो शब्द स्पष्टतापूर्वक सुनाई न देते हों और न ही स्पष्ट रूप से समझ में ही आते हों, ऐसे शब्दों को 'ध्वन्यात्मक शब्द' कहते हैं।

(ख) वर्णात्मक शब्द - ऐसे शब्द जो पृथक्-पृथक अक्षरों से पृथक-पृथक रूप से सुनाई देते हों, उन्हें 'वर्णात्मक शब्द' कहा जाता है।

मानव जीवन में भाषा प्रयोग की दृष्टि से 'ध्वन्यात्मक शब्दों' की अपेक्षा 'वर्णात्मक शब्दों' का महत्त्व अधिक है। 'वर्णनात्मक शब्द' जोकि भिन्न-भिन्न वर्णों (अक्षरों) के योग होने पर स्पष्ट रूप से सुनाई देते हैं, इन वर्णनात्मक शब्दों को अर्थ के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है।
(क) सार्थक शब्द
(ख) निरर्थक शब्द

(क) सार्थक शब्द - सार्थक शब्दों की श्रेणी में वे शब्द आते हैं जिन का उच्चारण करने पर कोई-न-कोई अर्थ स्पष्ट होता है। जैसे - नदी, पर्वत, व्यक्ति, घोड़ा, खेलना, धीरे-धीरे आदि सार्थक शब्द है क्योंकि ये अर्थ प्रदान कर रहे हैं।

(ख) निरर्थक शब्द - ऐसे शब्द जिनका मुख से उच्चारण तो होता है किन्तु उनका कोई अर्थ स्पष्ट नहीं होता ऐसे शब्दों को निरर्थक शब्द की श्रेणी में रखा जाता है। जैसे - गोऋव, रदब, गिलका, तमन्भो आदि। ये ऐसे शब्द है जिन से कोई अर्थ ही स्पष्ट नहीं होता, अतः ऐसे शब्द निरर्थक शब्द की श्रेणी में आते हैं।

सार्थक शब्दों का वर्गीकरण

हिन्दी भाषा में शब्दों का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जाता है, जिनमें चार आधार मुख्य हैं-
(अ) अर्थ के आधार पर
(ब) व्युत्पत्ति (रचना/बनावट) के आधार पर
(स) उत्पत्ति के आधार पर
(द) रूप परिवर्तन या व्याकरणिक अर्थ है और प्रयोग या वाक्य में प्रयोग के आधार पर

(अ) अर्थ के आधार पर - हिन्दी भाषा में कई शब्द ऐसे हैं जो भिन्न-भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। कभी उनका अर्थ सीधा, कभी लक्षण से निकलता है। इस अन्तर के कारण शब्दों के तीन भेद किये जाते हैं-
(क) वाचक
(ख) लाक्षणिक
(ग) व्यन्जक

(क) वाचक शब्द - जब किसी शब्द का उसी रूप में प्रयोग किया जाता है जिसके लिए वह बना है तो उसे 'वाचक शब्द' कहते हैं। शब्द की यह शक्ति जिससे उसके वाच्यार्थ का बोध होता हो तो शब्द की 'अभिधा शब्द शक्ति' कहलाती है।
जैसे - कोयल कुहू-कुहू बोलती है।
इसमें अर्थ लिया जाता है कि कोयल की बोली कुहू-कुहू है। वाचक शब्दों के अन्तर्गत शब्दों के ये प्रकार भी सम्मिलित होते हैं।

(अ) पर्यायवाची शब्द
(आ) अनेकार्थी शब्द
(इ) एकार्थी (एकार्थक) शब्द
(ई) विलोम या विपरीतार्थक शब्द
(उ) अनेक शब्दों हेतु एक शब्द (समग्र शब्द)

(अ) पर्यायवाची शब्द - ऐसे शब्द जिनके अर्थ में समानता हो, उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं।
जैसे- पर्वत - शैल, गिरि, अचल, पहाड़ आदि।
कमल - पंकज, जलज, वारिज आदि।
घर - गृह, सदन, आलय, निकेतन आदि।

(आ) अनेकार्थी शब्द - एक से अधिक अर्थ वाले शब्द इस वर्ग में आते हैं जैसे-
अंबर - कपड़ा, एक प्रकार की सुगन्ध, आकाश आदि।
गुण - रस्सी, धनुष की डोरी, स्वभाव, कौशल आदि।
कर - हाथ, हाथी की सूँड, क्रिया का रूप, टैक्स आदि।

(इ) एकार्थी (एकार्थक) शब्द - एकार्थी शब्दों का अर्थ सदैव एक ही रहता है। प्रायः व्यक्तिवाचक संज्ञा के शब्द इस वर्ण में आते हैं।
जैसे - ईश्वर, सत्य, दीवार, लोहा, वृक्ष, केला, हिमालय, दिल्ली, इतिहास, सूर्य, चन्द्रमा, पुस्तक आदि।

(ई) विलोम या विपरीतार्थ शब्द - विपरीत अर्थ बताने वाले शब्दों को विलोम शब्द कहा जाता है।
जैसे - जीवन - मरण
सच - झूठ
रात - दिन
काला - सफेद
ऊँचा - नीचा
राजा - रंक आदि।

(उ) अनेक शब्दों हेतु एक शब्द (समग्र शब्द) - ऐसा शब्द जो किसी शब्द समूह के बदले में केवल एक अकेला शब्द ही प्रयुक्त किया जाता है उसे ही अनेक शब्दों हेतु एक शब्द कहा जाता है।
उदाहरण -
१. जो मापा जा सके - 'अपरिमित'
२. सुंदर हृदय वाला - 'सहृदय'
३. लौटकर आया हुआ - 'प्रत्यागत'

(ख) लाक्षणिक शब्द - जब किसी शब्द से अपने वाच्यार्थ का बोध न होकर उससे सम्बन्धित किसी गुण का बोध होता है तो उसे 'लाक्षणिक शब्द' कहते हैं। शब्द की वह शक्ति जिससे उसके लक्ष्यार्थ का बोध होता हो 'लक्षणा शब्द शक्ति' कहलाती है।
जैसे - सुन्दरलाल बहुत काँव-काँव कर रहा है।
इस वाक्य में मुख्य अर्थ तो है 'काँव-काँव' करना है, लेकिन सुन्दरलाल का काँव-काँव करना सम्भव नहीं है अर्थात् अर्थ निकलता है, सुन्दरलाल कर्कश स्वर में या बहुत ज्यादा बोल या गा रहा है।

(ग) व्यन्जक शब्द - जिन शब्दों का न वाचक अर्थ होता है और लाक्षणिक अपितु उनमें किसी व्यंग्यार्थ का बोध होता हो, 'व्यन्जक शब्द' कहलाते हैं। जैसे-
रहिमन पानी रखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून॥
यहाँ अभिधार्थ एवं लक्षणार्थ के अतिरिक्त मानुस (मनुष्य) के अर्थ में इज्जत और मोती के अर्थ में चमक अर्थ संदर्भ विशेष में यह अर्थ व्यंग्यार्थ है। शब्द की वह शक्ति जिससे व्यंग्यार्थ बोध होता हो 'व्यंजना शब्द शक्ति' कहते हैं।

(ब) व्युत्पत्ति (रचना/बनावट) के आधार पर - व्युत्पत्ति का अर्थ है बनावट या रचना अर्थात् जो शब्द किसी के मेल से बनाए गए हों, वे बनावटी या उत्पत्ति वाले शब्द कहलाते हैं। ऐसे शब्दों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है।
(क) रूढ़ शब्द
(ख) यौगिक शब्द
(ग) यौगरूढ़ शब्द

(क) रूढ़ शब्द - वे शब्द जो प्रारम्भ से ही उत्पन्न हों तथा किसी दूसरे शब्दों की सहायता के बिना ही बनते हैं। इनके खण्ड नहीं हो सकते।
जैसे - कमल, दूध, श्याम आदि।

(ख) यौगिक शब्द - ऐसे शब्द जो दूसरे शब्दों के मेल से बनते है तथा जिनके सार्थक खण्ड किए जा सकते हैं, यौगिक शब्द कहलाते हैं।
जैसे- विद्यालय (विद्या + आलय)
राजरोग (राज + रोग)
अपव्यय (अप + व्यय)
श्रमिक (श्रम + इक) आदि।
यौगिक शब्दों की रचना निम्नलिखित विधियों द्वारा की जाती है।

(i) प्रत्यय के योग से - जैसे - सामाजिक (समाज + इक), आर्थिक (अर्थ + इक)। इनमें 'समाज' तथा 'अर्थ' रूढ़ शब्द हैं जिनमें 'इक' प्रत्यय जोड़ा गया है तथा 'सामाजिक' व 'आर्थिक' शब्दों का निर्माण हुआ है।

(ii) उपसर्ग के योग से - जैसे अपव्यय (अपव्यय), सगुण (स + गुण)। इनमें 'व्यय' तथा 'गुण' रूढ़ शब्द है जिनमें 'अप' तथा 'स' उपसर्ग लगने से 'अपव्यय' तथा 'सगुण' यौगिक शब्द बने हैं।

(iii) समास के द्वारा - जैसे- देशभक्ति (देश के लिए भक्ति), राजपुत्री (राजा की पुत्री) आदि। ये दोनों शब्द 'देश के लिए भक्ति' तथा 'राजा की पुत्री' से बने हैं। 'राजा' का संक्षिप्त रूप राज रह गया है तथा 'के लिए' तथा 'की' का लोप हो गया है।

(iv) संधि के द्वारा - जैसे- दिनेश (दिन + ईश) यहाँ पर अई मिलकर 'ए' बना है। जिससे 'दिनेश' रूपी यौगिक शब्द बन पाया है।

(ग) यौगरूढ़ शब्द - वे शब्द जिनमें यौगिक और रूढ़ दोनों ही शब्दों की शक्तियों का सम्मिश्रण हो जाए और जिसका अर्थ विशेष व्यक्ति या वस्तु के लिए हो संकुचित हो गया हो और व्यापक रूप से प्रयोग न होता हो।
जैसे - 'पंकज' इसका अर्थ पंक से उत्पन्न सभी वस्तुओं के लिए न होकर केवल 'कमल' है तथा दशानन अर्थात दश + आनन अर्थात् दस मुँह वाला रावण, निशाचर अर्थात निशाचर अर्थात् राक्षस आदि।

(स) उत्पत्ति के आधार पर - हिन्दी भाषा की शब्दावली के अनेक स्त्रोत हैं। कुछ शब्द अपनी संस्कृत मूल भाषा से तो कुछ अन्य स्वदेशीय भाषाओं से और कुछ विदेशी भाषाओं से लिए हैं। इस दृष्टि से शब्दों के छः भेद किए गए हैं।
(क) तत्सम
(ख) तद्भव
(ग) देशज
(घ) विदेशी
(ङ) द्विज (वर्ण संकर) शब्द
(च) अनुकरणात्मक।

(क) तत्सम शब्द - संस्कृत के वे मूल शब्द जो हिन्दी में भी ज्यों के त्यों प्रयोग होते हैं। तत्सम शब्द कहलाते हैं। जैसे - माता, पर्वत, सूर्य, रात्रि, निद्रा, नित्य, आज्ञा, आहार, ईर्ष्या, ईश, ऊर्जा, औषधि, गंगा, गीत, उच्चारण, चतुर, जय आदि।

(ख) तद्भव शब्द - हिन्दी में प्रयुक्त संस्कृत के ऐसे शब्द जिनमें कुछ जोड़कर या हटाकर थोड़े नवीन रूप मैं जब शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो इन्हें तद्भव कहते है। जैसे-
तत्सम - तद्भव
मयूर - मोर
अंक - आँक
उष्ट्र - ऊँट
दधि - दही
गोधूम - गेहूँ
भक्त - भगत
शत - सौ
दुग्ध - दूध
कर्करी - ककड़ी
कर्पूर - कपूर
कज्जल - काजल
काष्ठ - काठ
खर्जूर - खजूर
घंटिका - घंटी
चंद्र - चाँद
जिह्वा - जीभ
अंगोच्छा - अँगोछा
अग्नि - आग
अष्ट - आठ
ऊर्णा - ऊन
रक्षु - ईख
कंपन - काँपना
दश - डंक
तंतु - ताँत
धरित्री - धरती
नग्न - नंगा
पंख - पाँख
भ्रमर - भँवरा
रात्रि - रात
हस्त - हाथ

(ग) देशज शब्द - अपने ही देश की बोलचाल से आए शब्द देशज कहलाते है। जैसे - कुत्ता, रोटी, लोटा, बेटा, आटा, तिलौरी, दाढ़ी, ढीट, सोलंकी, साँठ, मुनियाँ, भड़ास, चसक, चमचम, टाली, डेढ, गिलौरी, काँगड़ा, कबड्डी, गलगल, पेठा, पपीता, भड़ास आदि।

(घ) विदेशी शब्द - अन्य भाषाओं के जो शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होने लगते है वे 'विदेशी' या 'विदेशज' शब्द कहलाते हैं। जैसे - स्टेशन, डॉक्टर, कानून, कूपन आदि। ऐसे ही अनेक 'विदेशी शब्द' जो अन्य भाषाओं से लिए गए हैं।
विदेशी शब्दों को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है।
(अ) विदेशी भाषाओं के शब्द
(ब) वर्ण संकर शब्द

(अ) विदेशी भाषाओं के शब्द - विदेशी भाषाओं के अंतर्गत निम्नलिखित विदेशी भाषाओं के शब्द हिन्दी भाषा में प्रयुक्त किए जाते हैं।
(i) अंग्रेजी भाषा के शब्द - सिगरेट, राशन, कॉलेज, रेडियो, बोतल, टिकट, कलक्टर, कमिश्नर, गवर्नर, चर्च, चॉकलेट, टाइफाइड, टायर, ट्यूब, टेबल आदि।

(ii) अरबी भाषा के शब्द - अक्ल, अजनबी, अजीब, इजाजत, इज्जत, कत्ल, गरीब, अमीर, औरत, मालिक, फकीर, कातिल, गजल, गदर, तबीयत, मरहम, मसीहा, महान, जिद, जिला, गैर, जनून, फरार, फर्ज आदि।

(iii) फारसी शब्द - किताब, गुलाब, मदरसा, शादी, जल्दी, आदमी, अंजीर, अंगूर, अंदेशा, अनार, चम्मच, आवारा, ईमानदार, आसमान, उम्मीद, किशमिश, निशान, जोश, नापाक, निगाह, विज्ञान, बच्चा, बदन, बदनाम, प्याला, फरमाइश आदि।

(iv) पुर्तगाली शब्द - आया (दाई), आलफिनेटर, (आलपीन), जेंमिला (जंगला), अनानास, पादरी, आलू, तौलिया, तम्बाकू, मालूल आदि।

(v) तुर्की शब्द - कालीन, काबू, लाश, तोप, तमगा, उजबक, उर्दू, एलची, कनात, कलगी, कुरता, कुमक, कोरमा, चकमक, चोगा, जुर्रा, बाबा, नाशपाती, बाबा, बुलाक, सौगात, बेगम आदि।

(vi) चीनी शब्द- चाय, पटाखा, तूफान आदि।

(vii) ग्रीक शब्द - दाम, सुरंग आदि।

(viii) रूसी शब्द - स्पूतनिक, मित्र, वोदका आदि।

(ix) फ्रेंच शब्द - कारतूस, पुलिस, बिगुल आदि।

(x) फ्रांसीसी शब्द - काजू, अंग्रेज, कारतूस आदि।

(ङ) द्विज (वर्ण संकर) शब्द - दो भाषाओं से बने शब्द 'द्विज' या 'वर्ण संकर' शब्द कहलाते हैं। इन शब्दों के अंतर्गत दो अलग-अलग भाषाओं से मिले-जुले शब्द इस प्रकार हैं।

(i) अरबी और फारसी से बने शब्द - आदमकद अलमस्त, किलेदार, गमगीन, खब्बसीर, जिल्दसाजी, तरफदार, नुकसानदेह, गैरजिम्मेदार, फिक्रमंद, बद्दुआ, गुस्लखाना, गलतफहमी, कलईदार, नेकनीयत आदि।

(ii) हिन्दी और अंग्रेजी से बने शब्द - टिकटघर, रेलगाड़ी, जेलयात्रा आदि।

(iii) हिन्दी और अरबी से बने शब्द - इमामबाड़ा, कसरती, कानूनिया, जूताखोर, अमलपटूटा, पानीदार, फलदार, बेधड़क, मसखरापन, नोकझोंक आदि।

(iv) हिन्दी और संस्कृत से बने शब्द - मांगपत्र, दर्शनयात्रा आदि।

(च) अनुकरणात्मक - ऐसे शब्द जो भौतिक जगत की वस्तुओं के द्वारा की जाने वाली ध्वनियों के आधार पर अनुकरण करते हुए भाषा में इनका प्रयोग किया जाता है तो ऐसे शब्दों को अनुकरणात्मक शब्द कहा जाता है।
उदाहरण -
जल के द्वारा होने वाली ध्वनि - कल-कल, झर-झर।
बरसात के द्वारा होने वाली ध्वनि - टप-टप, झमाझम।
हवा के द्वारा की जाने वाली ध्वनि - सर-सर, फर-फर।

(द) रूप परिवर्तन या व्याकरणिक अर्थ है और प्रयोग या वाक्य में प्रयोग के आधार पर - शब्दों के स्वरूप में परिवर्तन यह परिवर्तन के आधार पर शब्दों को दो भागों में बाँटा जा सकता है।
(क) विकारी शब्द
(ख) अविकारी शब्द

(क) विकारी शब्द - ऐसे शब्द जो जो विभिन्न कारणों से अपने रूप को परिवर्तित कर लेते हैं या ऐसे शब्दों में विकार पैदा हो जाता है तो इन्हें रूप परिवर्तन करने वाले या विकारी शब्द कहा जाता है। अर्थात विकारी शब्द वे हैं जो लिंङ्ग, वचन, कारक, पुरुष, काल आदि के कारण अपना रूप बदल लेते हैं। विकारी शब्दों के चार प्रकार हैं।
(१) संज्ञा
(२) सर्वनाम
(३) विशेषण
(४) क्रिया।

(१) संज्ञा - किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी अथवा भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।
जैसे- कृष्ण, दिल्ली, किताब, गर्मी, सुन्दरता आदि।
संज्ञा के भी तीन प्रकार हैं।
अ. व्यक्तिवाचक संज्ञा
आ. जातिवाचक संज्ञा
इ. भाववाचक

अ. व्यक्तिवाचक संज्ञा - किसी विशेष प्राणी, स्थान या वस्तु के नाम को व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे - महात्मा गाँधी, बम्बई, श्रीमद्भागवत् गीता।

आ. जातिवाचक संज्ञा - जो शब्द किसी साधारण जाति का बोध करवाते हों। जैसे- मानव, पशु, नगर, पुस्तक आदि।
जातिवाचक संज्ञा के दो उपभेद हैं।
(i) समुदायवाचक (समूह वाचक) संज्ञा
(ii) द्रव्य (पदार्थ) वाचक संज्ञा

(i) समुदाय वाचक (समूह वाचक) - किसी भी समूह को प्रकरण करने वाले शब्द समुदायकवाचक संज्ञा कहलाते हैं।
जैसे - सेना, कक्षा, भीड़।
(ii) द्रव्य (पदार्थ) वाचक - जिन वस्तुओं से अन्य वस्तुओं का निर्माण किया जावे, उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे - लोहा, मिट्टी, सोना।

इ. भाववाचक संज्ञा - वे नाम जो किसी गुण, दोष, स्वभाव या दशा आदि भावों को प्रकट करें, उन्हें भाववाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे - सुन्दरता, बुढ़ापा, मिठाई आदि।

लिंग, वचन एवं कारक के कारण रूप परिवर्तन - हिन्दी में संज्ञा, लिंग, वचन एवं कारक द्वारा अपना रूप परिवर्तन करती है। अतः ये विकारी शब्दों में आती है।
जैसे -
लिंग के कारण विकार -
सेठ - सेठानी
बालक - बालिका
वचन के कारण विकार
वस्तु - वस्तुएँ
किताब - किताबें

कारक के कारण विकार - वाक्य में अन्य शब्दों से सम्बन्ध पता लगता है।
जैसे -
राम ने रावण को बाण से मारा।

(२) सर्वनाम - संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द सर्वनाम कहलाते हैं। सर्वनाम के सात भेद होते हैं।
1. पुरुष वाचक - मैं, तुम, आप।
2. निश्चयवाचक - यह, वह।
3. अनिश्चयवाचक - कोई, कुछ।
4. प्रश्नवाचक - कौन, क्या, कैसे, कहाँ।
5. सम्बन्धवाचक - जो।
6. सहसम्बन्धवाचक - सो।
7. निजवाचक - आप, स्वयं, खुद।

टीप - संज्ञा की तरह सर्वनामों का रूपान्तर पुरुष, वाचक और कारक की दृष्टि से है। इसमें लिंग भेद नहीं होता है।

(३) विशेषण - संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द विशेषण कहलाते हैं। विशेषण के भी चार प्रकार हैं-
(अ) गुणवाचक विशेषण
(आ) संख्यावाचक विशेषण
(इ) परिमाणवाचक विशेषण
(ई) सार्वनामिक विशेषण

1. गुणवाचक विशेषण - संज्ञा के गुण रंग, दशा, काल, स्थान, आकार का ज्ञान कराये।
जैसे - मीठा फल, सफेद मीनार, गोल हीरा, बीमार आदमी आदि।

(आ) संख्यावाचक विशेषण - संज्ञा की संख्या सम्बन्धी विशेषता बताने शब्द।
जैसे - एक, दो गुना, दसवाँ आदि।

(इ) परिमाणवाचक विशेषण - नाप-तौल की विशेषता बताने वाले शब्द।
जैसे - कुछ फल, थोड़ा दूध, फूलों का ढेर, पाँच मीटर कपड़ा आदि।

(ई) सार्वनामिक विशेषण - जो शब्द संज्ञा से पहले प्रयुक्त होकर विशेषण का काम करते हों।
जैसे - यह बालक, वह विद्यालय, उस व्यक्ति ने आदि।

(४) क्रिया - जिस शब्द में किसी काम का करना या होना पाया जाए उसे क्रिया कहते हैं। क्रिया के दो भेद हैं।
(अ) सकर्मक क्रिया
(आ) अकर्मक क्रिया

(अ) सकर्मक क्रिया - जहाँ क्रिया का फल कर्म पर पड़े वहाँ सकर्मक क्रिया होती है।
जैसे - मैं पुस्तक पढ़ता हूँ। यहाँ पढ़ने का फल पुस्तक पर पड़ रहा है।

(आ) अकर्मक क्रिया - जहाँ क्रिया का फल कर्ता पर पड़े।
जैसे - वह भागता है। यहाँ पर भागने का फल कर्ता पर पड़ रहा है।

(ख) अविकारी शब्द - ऐसे शब्द जिनका स्वरूप किसी भी स्थिति में नहीं बदलता वह ज्यों के त्यों प्रयुक्त होते हैं, ऐसे शब्दों को अविकारी शब्द कहा जाता है। अविकारी शब्दों के भी चार प्रकार हैं।
(१) क्रिया विशेषण
(२) समुच्चय बोधक
(३) संबंध बोधक तथा
(४) विस्मयादिबोधक शब्द।

(१) क्रिया विशेषण - क्रिया की विशेषता बताने वाले अविकारी शब्द क्रिया विशेष कहलाते हैं।
जैसे - वह प्रतिदिन पढ़ता है। रमेश यहाँ रहता है। इन वाक्यों में 'प्रतिदिन' और 'यहाँ' शब्द अविकारी हैं।

(२) समुच्चय बोधक अव्यय - दो शब्दों, वाक्यांशों अथवा वाक्यों को मिलाने वाले अविकारी शब्द समुच्चय बोधक शब्द कहलाते हैं।
जैसे - और, परन्तु, क्योंकि, तथा, एवं, अगर, इसलिए।

(३) सम्बन्धबोधक - वे अविकारी शब्द हैं, जो संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के साथ आकर उनका सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों के साथ बताते हैं।
जैसे - बिना, पास, द्वारा, कई, पर, तक।

(४) विस्मयादिबोधक अव्यय - हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा, क्रोध आदि मनोभावों या संवेगों को प्रकट करने वाले अविकारी शब्द विस्मयादिबोधक शब्द कहलाते हैं।
जैसे - ओह! वाह! वाह, हाय-हाय! बाप रे!, ओहो!, छिः छिः!, धिक्, अच्छा!, अरे!, रे!

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I Hope the above information will be useful and important.
(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
rfhindi.com

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