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व्यन्जनों का वर्गीकरण || व्यन्जनों के प्रकार - प्रयत्न, स्थान, स्वरतंत्रीय, प्राणत्व के आधार पर

  • BY:
     RF Temre
  • Posted on:
    January 01, 1970

पिछले लेख में स्वरों के वर्गीकरण के बारे में जानकारी दी गई है। मुख के विभिन्न अवयवों के आधार पर उच्चारण स्थिति को देखते हुए स्वरों के प्रकार बताए गए हैं। इस लेख में व्यन्जन वर्णों का वर्गीकरण अर्थात इनके प्रकारों के बारे में जानकारी दी गई है।

व्यन्जनों का वर्गीकरण

व्यन्जनों का वर्गीकरण निम्नलिखित चार आधार पर किया जाता है -
(क) प्रयत्न के आधार
(ख) स्थान के आधार पर
(ग) स्वरतन्त्रिय आधार पर
(घ) प्राणत्व के आधार

(क) प्रयत्न के आधार पर-

प्रयत्न के आधार पर व्यन्जनों का वर्गीकरण निम्नानुसार किया जाता है-
(i) स्पर्शी (स्पर्श व्यंजन)
(ii) संघर्षी व्यन्जन
(iii) स्पर्श संघर्षी व्यन्जन
(iv) नासिक्य व्यन्जन
(v) पार्श्विक व्यन्जन
(vi) उत्क्षिप्त व्यन्जन
(vii) लुण्ठित व्यन्जन
(viii) अर्द्धस्वर व्यन्जन

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(i) स्पर्श व्यन्जन - जब व्यन्जनों का उच्चारण मुख के अवयवों का परस्पर पूर्ण स्पर्श करने पर होता है, तब उन्हें स्पर्श व्यन्जन कहते हैं। इनके उच्चारण में पहले हवा मुख में रूक जाती है, फिर धक्का देकर बाहर निकलती है।
हिन्दी में 'क', 'च', 'ट', 'त', 'प' (पाँचों वर्ग) के स्पर्श व्यन्जन हैं।
'क' वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ
'च' वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ
'ट' वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण
'त' वर्ग - त, थ, द, ध, न
'प' वर्ग - प, फ, ब, भ, म

(ii) संघर्षी व्यन्जन - नाम से स्पष्ट है जिन वर्णों के उच्चारण में जब कुछ संघर्ष करना पड़े। जब व्यन्जनों उच्चारण करते समय दो अवयव इतने निकट आ जाते हैं कि हवा दोनों के बीच से घर्षण करती हुई निकलती है।
जैसे- 'फ', 'ज', 'श', 'ख', 'ग'।

(iii) स्पर्श संघर्षी व्यन्जन - इस प्रकार के व्यन्जनों के उच्चारण में पहले स्पर्श और बाद में घर्षण होता है।
जैसे- 'च', 'छ', 'झ'।

(vi) नासिक्य व्यन्जन - जिन व्यन्जनों के उच्चारण में हवा नाक से निकलती है, वे नासिक्य कहलाते हैं। व्यन्जनों में पाँचों वर्गों के पञ्चम वर्ण नासिक्य हैं।
जैसे - 'ङ', 'ञ', 'ण', 'न', 'म'

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(v) पार्श्विक व्यन्जन - जिस वर्ण के उच्चारण में मुख के मध्य भाग में दो अवयव मिलकर वायु अवरूद्ध कर देते हैं, किन्तु हवा दोनों पार्श्वों से होकर निकल जाती है।
जैसे- 'ल'

(vi) अत्क्षिप्त व्यन्जन - इनके उच्चारण में जिह्वा नोक कठोर तालु को छूकर झटके से नीचे आकर वायु निकालती है उन्हें अत्क्षिप्त व्यन्जन कहते हैं।
जैसे- 'ड', 'ढ'

(vii) लुण्ठित व्यन्जन - जिन व्यन्जनों के उच्चारण में हवा मसूड़े के पास आकर कुछ कम्पनता उत्पन्न करती है, उन्हें लुण्ठित व्यन्जन कहते हैं।
जैसे- 'र'

(viii) ऊर्द्ध व्यन्जन - हिन्दी में 'य', 'व', ऊर्द्ध व्यन्जन हैं।
'य' - इसके उच्चारण में ओंठ फैले या कभी तटस्थ रहते हैं।
'व' - इसके उच्चारण में ओंठ फैले रहते हैं।

(ख) स्थान के आधार पर-

उच्चारण स्थानों के आधार पर व्यन्जनों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है-
(i) कण्ठय व्यन्जन
(ii) तालव्य व्यन्जन
(iii) मूर्धन्य व्यन्जन
(iv) दन्त्य व्यन्जन
(v) ओष्ठ व्यन्जन
(vi) नासिक्य व्यन्जन
(vii) वर्त्स्य व्यन्जन
(viii) दन्त्योष्ठय व्यन्जन

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(i) कण्ठय व्यन्जन - इनका उच्चारण कण्ठ (अल जिह्वा) से होता है। संस्कृत सूत्र- "अ कु ह विसर्जनीयानां कण्ठः" अर्थात् 'अ', 'क' वर्ग और 'ह' का उच्चारण कष्ठ से होता है।
जैसे- 'अ', 'क', 'ख', 'ग', 'घ', 'ह'

(ii) तालव्य व्यन्जन - जब जिह्वा का पिछला भाग कोमल तालु को स्पर्श करता है, तब इन व्यन्जनों का उच्चारण होता है। संस्कृत सूत्र- "इ-चु-य-शानां तालु" अर्थात् 'इ', 'च' वर्ग तथा 'श' का उच्चारण तालु से होता है।
जैसे - 'इ', 'छ', 'ज', 'झ', 'श'

(iii) मूर्धन्य व्यन्जन - इन व्यन्जनों के उच्चारण में जिह्वा नोक कठोर तालु के आगे के भाग को स्पर्श करती है। संस्कृत सूत्र- "ऋ-टु-र-षाणां मूर्धा।" अर्थात् 'ॠ' 'ट' वर्ग और 'श' का उच्चारण मूर्धा से होता है।

(iv) दन्त्य व्यन्जन - वे व्यन्जन जिनके उच्चारण में जिह्वा नोक ऊपरी दाँतों को स्पर्श करती है। संस्कृत सूत्र- "लृ-तु-ल-सानां दन्ता:।" अर्थात् 'लृ', 'त', 'घ', 'द', 'ध', और 'स' का उच्चारण दन्त्य है।

(v) ओष्ठव्य व्यन्जन - वे व्यन्जन जो दोनों ओंठों से उच्चारित होने वाली ध्वनि ओष्ष्ठव्य कहलाते हैं। संस्कृत सूत्र- "उ-पु-उपध्मानीयानाम् ओष्ठौ" अर्थात् 'उ', 'प' वर्ग, 'भ', 'म' का उच्चारण ओंष्ठों से होता है।

(vi) नासिक्य व्यन्जन - जिन वर्णों के उच्चारण में वायु नाक से निकलती है, वे नासिक्य हैं। संस्कृत सूत्र- "ञ-म-ङ-ण-नानां नासिका च" व्यन्जनों के पाँचों वर्ग के पञ्चम वर्ण नासिक्य हैं।
उदाहरण- 'ङ', 'ञ', 'ण', 'न', 'म'।

(vii) वर्त्स्य व्यन्जन - जिन व्यन्जनों के उच्चारण में जीभ की नोक तालू के अन्तिम भाग एवं मसूड़ों को स्पर्श करती है वे वर्त्स्य व्यन्जन कहलाते हैं।
जैसे- 'न्ह', 'न', 'ल', 'र', 'स', 'ज'।

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(viii) दन्त्योष्ठय व्यन्जन - जिन व्यन्जनों के उच्चारण में दाँत और ओंठों का प्रयोग होता है वे दन्त्योष्ठय व्यन्जन कहलाते हैं। संस्कृत सूत्र- "ब कारस्य दन्तोष्ठम् " अर्थात् नीचे के ओंठ और ऊपर के दाँत से बोली जाने वाली ध्वनियाँ दन्त्योष्ठ्य हैं।
जैसे - 'फ', 'ब'

(ग) स्वर-तन्त्रियों को आधार पर -

स्वरतन्त्रिय आधार पर व्यन्जनों के दो भेद हैं -
(i) घोष
(ii) अघोष

(i) घोष - जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतन्त्रियों के निकट आ जाने से उनके बीच से हवा निकलती तो उनमें कम्पन होता है।
जैसे- हिन्दी में पाँच वर्ग - 'क', 'च', 'ट', 'त', 'प' के तीसरे, चौथे और पाँचवें वर्ण घोष ध्वनि में हैं। ये घोष व्यंजन कहलाते हैं।
उदाहरण- 'ग', 'घ', 'ङ', 'ज', 'झ', 'ञ', 'ड', 'ढ', 'ण', 'द', 'ध', 'न', 'ब', 'भ', 'म'।

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(ii) अघोष - जिन व्यन्जनों के उच्चारण में स्वरतन्त्रियाँ न तो निकट आती है और न ही उनके बीच से गुजरती हवा में किसी प्रकार का कम्पन्न होता है, वे अघोष ध्वनि कहलाती है। जैसे- हिन्दी के पाँचों वर्ग के पहले और दूसरे वर्ण अघोष व्यन्जन हैं।
जैसे- 'क', 'ख', 'च', 'छ', 'ट', 'ठ', 'त', 'थ', 'प', 'फ'

(घ) प्राणत्व (वायु के बाहर निकलने) के आधार पर -

प्राणत्व के आधार पर शब्द के दो भेद हैं-
(i) अल्पप्राण
(ii) महाप्राण

(i) अल्पप्राण - जिन वर्णों के उच्चारण में हवा का प्रवाह (मुख से बाहर निकलना) की कम अधिकता रहती है या हवा का बल कम हो, उन्हें 'अल्पप्राण' कहते हैं। संस्कृत सूत्र - 'वर्णानाम् प्रथम, तृतीय, पञ्चमीयणश्च अल्पप्राणाः"।
अर्थात्- 'क', 'ग', 'ङ'
'च', 'ज', 'ञ'
'ट', 'ड', 'ण'
'त', 'द', 'न'
'प', 'ब', 'म'

और 'य', 'र', 'ल','व' व्यन्जन अल्पप्राण हैं।

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(ii) महाप्राण - जिन व्यन्जनों के उच्चारण में हवा की अधिकता हो या श्वास बल अधिक हो, अर्थात वायु मुख द्वार से ज्यादा समय तक बाहर निकलती हो उन्हें 'महाप्राण' कहते हैं। महाप्राण के उच्चारण में हवा में अकार जैसी ध्वनि रहती है और इसका उच्चारण श्रम के साथ करना पड़ता है। संस्कृत सूत्र - "वर्णानाम् द्वितीय, चतुर्थी शलश्च महाप्राणाः" अर्थात् 'ख', 'घ', 'छ', 'झ', 'ठ', 'ढ', 'थ', 'ध', 'फ','भ' और 'श', 'ष', 'स', 'ह', व्यन्जन महाप्राण हैं।

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आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope the above information will be useful and important. )
Thank you.
R. F. Tembhre
(Teacher)
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